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धर्मनाथ बीज : धर्मनाथ की कथा

माघ शुक्ल द्वितीया को अनेक स्थानों पर धर्मनाथ बीज मनाई जाती है। नवनाथों में गोरक्षनाथ की शिष्य परंपरा में चौरंगीनाथ, अडबंगनाथ और धर्मनाथ हुए। इनमें धर्मनाथ की कथा अत्यंत रसपूर्ण और अद्भुत है। आइए उसे विस्तार से देखें—

श्रीमद्भागवत में ऋषभदेव के सौ पुत्रों में से नौ पुत्र भगवद्भक्त के रूप में प्रसिद्ध हैं। भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से इन नवनारायणों ने कलियुग में अवतार लेकर जगत के कल्याण हेतु नवनाथ संप्रदाय की स्थापना

की। वे इस प्रकार हैं—

  1. कवि नारायण – मच्छिंद्रनाथ
  2. हरिनारायण – गोरक्षनाथ
  3. करभंजन नारायण – गहिनीनाथ
  4. अंतरिक्ष नारायण – जालंधरनाथ
  5. प्रबुद्ध नारायण – कानिफनाथ
  6. अविहोत्र नारायण – वट सिद्धनाथ (नागेश)
  7. दुर्मिल नारायण – भर्तरीनाथ
  8. चमसनारायण – रेवननाथ
  9. पिप्पलायन नारायण – चर्पटनाथ

एक बार मच्छिंद्रनाथ और गोरक्षनाथ अपने सद्गुरु श्री दत्तात्रेय प्रभु से मिलने गिरनार पर्वत आए। आपस में अनेक घटनाओं की चर्चा हुई। श्रीगुरु ने उन्हें छह महीने तक अपने पास रखा। बाद में गोरक्षनाथ ने कहा, “हमारा जन्म जगत-कल्याण और परोपकार के लिए हुआ है, इसलिए हमें तीर्थयात्रा की अनुमति दें।” दत्तगुरु ने भारी मन से उन्हें विदा किया।

मच्छिंद्रनाथ और गोरक्षनाथ काशी की ओर चले और मार्ग में प्रयाग पहुँचे। उस समय वहाँ त्रिविक्रम नामक राजा का राज्य था। रानी का नाम रेवती था। उन्हें कोई संतान नहीं थी। राजा त्रिविक्रम उदार, ज्ञानी, परोपकारी और प्रजाहितैषी थे। वे प्रजा से पुत्रवत प्रेम करते थे, इसलिए प्रजा सुखी थी और राजा-रानी से अत्यंत प्रेम करती थी।

जब मच्छिंद्रनाथ और गोरक्षनाथ प्रयाग पहुँचे, तब राजा त्रिविक्रम का देहांत हो चुका था। राज्य में हाहाकार मचा था। रानी रेवती अत्यंत दुःखी थीं। यह दृश्य देखकर मच्छिंद्रनाथ के मन में राजा को जीवित करने का विचार आया, किंतु अंतर्ज्ञान से उन्होंने देखा कि राजा की आयु पूर्ण हो चुकी थी और आत्मा ब्रह्मस्वरूप में विलीन हो चुकी थी, अतः पुनर्जन्म संभव नहीं था।

दोनों गुरु नगर के बाहर शिवालय में ठहरे, जिसके सामने श्मशान था। वहीं राजा त्रिविक्रम का अंत्येष्टि संस्कार होने वाला था। प्रजा का शोक देखकर गोरक्षनाथ का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने राजा को जीवित करने का आग्रह किया। मच्छिंद्रनाथ ने समझाया कि यह असंभव है। गोरक्षनाथ शांत हो गए।

तब मच्छिंद्रनाथ ने एक उपाय बताया—वे योगबल से राजा के शरीर में प्रवेश करेंगे, बारह वर्ष तक राज्य चलाएँगे और फिर अपने शरीर में लौट आएँगे। इस बीच गोरक्षनाथ उनके शरीर की रक्षा करेंगे। गोरक्षनाथ ने सहमति दी। मच्छिंद्रनाथ ने अपना शरीर स्थिर कर राजा के मृत शरीर में प्रवेश किया और राजा जीवित हो उठा।

राजा के जीवित होते ही प्रजा आनंदित हो गई। विधिपूर्वक श्मशान में प्रतीकात्मक संस्कार कर राजा को नगर में ले जाया गया।

इधर गोरक्षनाथ ने मच्छिंद्रनाथ के शरीर की रक्षा के लिए एक गुप्त भूयार में उसे सुरक्षित रखा। एक स्त्री की सहायता से यह कार्य गुप्त रूप से संपन्न हुआ।

राजा के रूप में मच्छिंद्रनाथ ने न्यायपूर्वक राज्य चलाया। रानी रेवती को कोई संदेह नहीं हुआ। वे प्रतिदिन शिवालय जाते और अपने शरीर की कुशलता की जानकारी लेते रहे। कुछ समय बाद रानी गर्भवती हुई और एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसका नाम धर्मनाथ रखा गया।

पाँच वर्ष बाद एक दिन रानी ने भगवान शंकर से सौभाग्य में ही मृत्यु की प्रार्थना की। वहाँ उपस्थित एक स्त्री हँस पड़ी। पूछने पर उसने सत्य बताया कि राजा वास्तव में मच्छिंद्रनाथ हैं और बारह वर्ष बाद वे शरीर त्याग देंगे, तब रानी को वैधव्य प्राप्त होगा। यह जानकर रानी भयभीत हो गई और उसने मच्छिंद्रनाथ के मूल शरीर को नष्ट करवा दिया।

यह घटना जानकर माता पार्वती ने भगवान शंकर को बताया। शंकर ने आदेश दिया कि मच्छिंद्रनाथ के शरीर के अवशेष कैलास लाए जाएँ। यक्षिणियों और चामुंडाओं ने अवशेष एकत्र किए और वीरभद्र की रक्षा में रखे।

बारह वर्ष पूर्ण होने पर गोरक्षनाथ और चौरंगीनाथ प्रयाग आए। उन्हें सारा सत्य ज्ञात हुआ। योगबल से खोज कर गोरक्षनाथ ने गुरु के अवशेष प्राप्त किए। युद्ध, देवताओं की मध्यस्थता और संजीवनी मंत्र से वीरभद्र को पुनर्जीवित कर, अंततः मच्छिंद्रनाथ के शरीर को सुरक्षित लाया गया।

राजा के रूप में मच्छिंद्रनाथ ने धर्मनाथ का भव्य राज्याभिषेक किया और फिर अपने शरीर में लौट आए। राजा त्रिविक्रम के शरीर का अंत हो गया। धर्मनाथ को सारा रहस्य बताया गया। बाद में धर्मनाथ ने तीनों नाथों का सम्मान किया और शासन संभाला।

माघ शुक्ल द्वितीया को गोरक्षनाथ ने धर्मनाथ को गुरुदीक्षा दी। उसी दिन को धर्मनाथ बीज कहा गया। इस अवसर पर प्रसाद वितरण हुआ और तभी से यह पर्व प्रतिवर्ष मनाया जाने लगा।

गोरक्षनाथ ने कहा कि माघ शुक्ल द्वितीया को भोजन-दान करने से दरिद्रता, दुःख, रोग और भय का नाश होता है, लक्ष्मी का वास होता है और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

अंत में धर्मनाथ को योगविद्या सिखाकर उसे बदरिकाश्रम में तपस्या हेतु सौंपा गया। बाद में देवताओं ने उसे आशीर्वाद दिए। इस प्रकार धर्मनाथ बीज की परंपरा स्थापित हुई।

मनोगत
‘पंढरी संदेश’ ने मुझे धर्मनाथ बीज की कथा लिखने का दायित्व दिया। नाथों की महिमा लिखना सामान्य मनुष्य की सामर्थ्य से परे है, परंतु गुरु कृपा से यह संभव हुआ।

जय अलख निरंजन
अलख अर्थात जो देखा न जा सके, निरंजन अर्थात जो मलिनता से रहित हो; अर्थात पूर्ण तेजोमय ब्रह्म।

आदेश
आत्मा, जीवात्मा और परमात्मा एक ही हैं, इसका बोध कराने वाला शब्द।

॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

शांत मन से बस अलिप्त हो जाइए!

दत्त की गाय

श्री दत्त प्रसन्न हैं!

श्री क्षेत्र गिरनार दत्तप्रभूंचे अक्षय निवासस्थान

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