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उगवतीचे रंग” - मन को झकझोर देने वाला नाट्य अनुभव

संगीत देवबाभळी : मन को झकझोर देने वाला नाट्य अनुभव

(लेखक के आनंदनिधान पुस्तक से। उन्होंने स्वयं यह नाट्य समीक्षा लिखी है।)

देवबाभळी जैसा फीका-सा नाम किसी नाटक का हो सकता है—ऐसा कभी सोचा नहीं था। इससे भी बड़ी आश्चर्य की बात यह कि यह एक संगीत नाटक होगा और उससे भी आगे यह कि यह एक मन को थर्रा देने वाला नाट्य अनुभव होगा—यह भी कभी कल्पना नहीं की थी।
लेकिन कहते हैं—Truth is stranger than fiction—मेरे साथ भी यही हुआ।
पुणे प्रवास के दौरान यह नाटक देखने का अवसर मिला और जो देखा उसने मन भर दिया। इसे नहीं देखा होता तो सचमुच एक सुन्दर आनंद से वंचित रह जाता।

असल में यह नाटक संत तुकाराम की पत्नी आवली और भगवान विठ्ठल की पत्नी देवी रुक्मिणी पर आधारित है। पूरे नाटक में सिर्फ इन्हीं दो स्त्रियों की भूमिकाएँ हैं। तुकाराम महाराज और विठ्ठल का बार-बार उल्लेख होता है, परंतु वे पात्र रूप में रंगमंच पर दिखाई नहीं देते—फिर भी वे पूरे नाटक में एक अदृश्य उपस्थिति की तरह छाए रहते हैं।

तो फिर नाम “देवबाभळी” क्यों?

इसका श्रेय नाटककार-निर्देशक प्राजक्त देशमुख को जाता है।
नाटक में एक प्रसंग आता है—आवली के पैर में बाभळी (कांटेदार पेड़) का काँटा चुभ जाता है। वह काँटा निकालने आते हैं स्वयं विठ्ठल। काँटा निकाल देने पर भी उसके दर्द का असर पूरे नाटक में दिखाई देता है।
विठ्ठल यहीं नहीं रुकते—वे अपनी पत्नी रुक्मिणी को आवली की सेवा के लिए भेजते हैं, क्योंकि उस समय आवली गर्भवती होती है।
यह ‘देव-बाभळी’ का काँटा तो बस एक बहाना है—पर इसी बहाने विठ्ठल का भक्त-प्रेम दिखता है और रुक्मिणी व आवली एक साथ आती हैं। दोनों का दुःख कहीं न कहीं एक जैसा है—उनके मन की वेदना, स्त्री-सुलभ भावनाएँ और अपने-अपने पति के प्रति प्रेम—सब इस मौके पर उजागर होता है।

नाटक का पर्दा उठता है—आंगन में गोबर से लीप-पोत करती हुई आवली दिखाई देती है।
वह गाती है, सुबह का कोमल वातावरण दिखता है, रसोई से आती धूप की किरणें और चूल्हे का धुआँ दिखाई देता है।
आवली भाकरी बनाती है और उन्हें भंडारा पहाड़ी पर बैठे अपने पति तुकाराम बुवा को देने जाती है।
“आवो… आवो…” की उसकी करुण पुकार हृदय छू जाती है।

डोंगर उतरते समय उसके पैर में बाभळी का काँटा घुस जाता है और वह गिर पड़ती है।
होश आता है तो खुद को घर की रसोई में पाती है। चूल्हे के पास कोई स्त्री भाकरी बनाते दिखती है।
घर में यह नई औरत कौन? मन में शंका—कहीं तुकाराम बुवा ने…?

वह पूछती है—“कौन हो तुम? मेरे घर में कैसे आई?”
स्त्री उत्तर देती है—“मेरा नाम लखुबाई है। आपकी देखभाल करने के लिए भेजा गया है।”
लखुबाई यानी रुक्मिणी, जो विठ्ठल के कहने पर आई है।

आवली बहुत गुस्सैल स्वभाव की है—वह तो विठ्ठल को भी उल्टी-सीधी सुनाती है।
कारण यह कि उसका पति तुकाराम—विठ्ठल-भक्ति में इतना डूबा है कि न पत्नी की सुध, न घर-गृहस्थी की चिंता। इसलिए आवली विठ्ठल को “पंढरी का भूत” कहती है।

आवली विठ्ठल को “फूटी हुई पुरानी चोट” भी कहती है—पर विडंबना यह है कि उस पर गुस्सा करते हुए भी वह विठ्ठल का ही नाम लेती रहती है—यानी वह भी एक तरह से भक्त ही है।

रुक्मिणी उसके पैर की पट्टी करती है, उसके घर में बैठकर भाकरी बनाती है।
जब वह पूछती है—“भाकरी का एक टुकड़ा मिल जाए तो?”
आवली मुस्कुरा कर कहती है—“टुकड़ा क्यों? पूरी भाकरी दूँगी।”
यहीं से आवली का कोमल हृदय सामने आता है।

रुक्मिणी जब चूल्हे के सामने बैठकर भाकरी सेकती है—उसके चेहरे पर अंगारों की रोशनी गिरती है—इतना जीवंत दृश्य कि नाटक नहीं, वास्तविकता लगती है।
घर लीपती हुई आवली का दृश्य भी इतना सजीव कि आज की पीढ़ी को यह भूली-बिसरी परंपरा पता चल जाएगी।

आवली का तुकाराम पर जो गुस्सा है—वैसा ही रुक्मिणी का भी विठ्ठल पर है।
पंढरपुर में विठ्ठल और रुक्मिणी के मंदिर अलग-अलग हैं।
जैसे श्रीकृष्ण ने द्वारका जाकर भी राधा-प्रेम नहीं छोड़ा था, वैसे ही विठ्ठल भक्तों में तल्लीन रहते हैं—यही रुक्मिणी की शिकायत है।

वह देखने आई थी कि कौन है वह स्त्री जिसके पैर का काँटा विठ्ठल ने अपने हाथों से निकाला।
आवली भक्त की पत्नी है—गर्भावस्था में भी अपने पति को भोजन देकर आती है, इसलिए विठ्ठल रुक्मिणी को उसकी सेवा को भेजते हैं।

यही स्थिति दोनों को पास लाती है।
संवाद अत्यंत हृदयस्पर्शी—आज भी उतने ही प्रासंगिक।

रुक्मिणी पूछती है—“तुम्हारे घर में तो कुछ नहीं—फिर कैसे चलता है जीवन?”
आवली तुकाराम का अभंग उद्धृत करती है—
“हमारे घर में धन हैं—शब्दों के ही रत्न…”
यह सुनकर दर्शक मौन हो जाते हैं।

रुक्मिणी पूछती है—“फिर घर छोड़कर क्यों नहीं चली जाती?”
आवली का उत्तर आँखें खोल देने वाला—
“जाकर करूँगी क्या? मेरे रहने से उसे कम से कम खाना तो मिलता है।
मैं कोई रुक्मिणी थोड़े ही हूँ जो रूठकर चली जाऊँ?
और अगर चली भी गई—तो लौटने पर घर (पति) वहीँ मिलेगा—इसकी क्या गारंटी?”

आज छोटी-छोटी बातों पर पति-पत्नी अलग होने लगते हैं—आवली का संवाद उनके लिए भी सीख है।

रुक्मिणी कहती है—“हम दोनों गर्भगृह के बाहर हैं—पर तुम बाहर रहकर भी गर्भगृह की गूँज बन गई हो।”

वह आवली को जीवन का आनंद लेना सिखाती है।
उसे वर्षा में ले जाती है—
“देख, ऐसे बारिश में मन खोलकर भीगना चाहिए—सब भूलकर—मुक्त होकर।”

नाटक में एक संवाद—
“कडेलोट तक पहुँचे बिना भाकरी क्यों पलटना? उबलने से पहले ही बर्तन क्यों उतारना?”
स्त्री-मन, सहनशीलता और उसके संघर्ष को सुंदर ढंग से व्यक्त किया गया है।

समग्र रूप से यह नाटक विठ्ठल से सीधी अनुभूति जोड़ता है।
एक ही मंच पर देहू नगरी साकार हो उठती है—तुकाराम का वाडा, आवली की रसोई, भंडारा पर्वत, इंद्रायणी घाट—सब जीवंत दिखते हैं।

संगीत—तबला, पखावज, संवादिनी, सितार—मन को प्रसन्न करता है।
संवाद, अभंग—शुभांगी सदावर्ते (आवली) और मानसी जोशी (रुक्मिणी) ने उन्हें सोने-सा मूल्य दिया है।
आनंद भाटे का पार्श्वगायन भक्ति-रस में डुबो देता है।

शुभांगी और मानसी का अभिनय नाटक का सबसे बड़ा आकर्षण है—
आवली के “आवो आवो…” पुकारते शब्द हृदय चीर देते हैं।
मानसी जब विठ्ठल की मूर्ति से बात करती है—तो लगता है मानो विठ्ठल सामने खड़े हों।

दृश्य—आवली के रहस्यमय स्वप्न, गाथा की उड़ती पत्तियाँ, इंद्रायणी में बहती गाथा—सब मानो जीवित हो उठते हैं।

भद्रकाली प्रोडक्शन्स की यह कृति मच्छिंद्र कांबली की परंपरा को आगे ले जाती है।
देवबाभळी एक अनोखा संगीत नाटक है—इसके गीत हर बार मंच पर प्रत्यक्ष गाए जाते हैं—रिकॉर्ड नहीं।

प्राजक्त देशमुख के संवाद, लोकसंगीत, अभंग, ओवी का सुंदर उपयोग—मराठी संत-परंपरा और मराठी संस्कार का दर्शन कराता है।
नाटक को 44 पुरस्कार मिले हैं—महाराष्ट्र शासन, साहित्य अकादमी आदि।
फोर्ब्स ने इसे सबसे लोकप्रिय नाटक के रूप में दर्ज किया है।

सिर्फ दो स्त्री पात्रों के दम पर इतना प्रभावशाली नाटक—अद्भुत!
शुभांगी और मानसी—दोनों को सलाम।

यह नाटक जल्द ही अपने 500वें प्रयोग तक पहुँचने वाला है।
जिन्होंने नहीं देखा—एक बार अवश्य देखें।
और देखा है—तो इस दृष्टिकोण से दुबारा देखें।

उभरते रंग – फिटे अंधाराचे जाळे

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